viernes, 22 de noviembre de 2013

गोबर केजरीवाल नहीं, अन्ना गोबर है। जनता को धोखा केजरीवाल ने नहीं, अन्ना ने दिया है। जब बिना शर्त अन्ना को केजरीवाल का साथ देना चाहिए तो वो एक तख्ती लटका कर बैठा हुआ है के "मैं दुनिया का सबसे शरीफ और ईमानदार इंसान हूँ". जिस शख्श को इतनी समझ नहीं के असल करम करने के वक़त विरोधिओं ने धीरे धीरे कैसे एक आंदोलन को दोफाड़ कर के कुचल डाला वो गोबर नहीं तो और क्या है ?

मैं यह समझता हूँ के जो केजरीवाल जो  कर रहा है वो बिलकुल सही है . अन्ना ने तो सिर्फ़ आपके सपनों  को हवा दी लेकिन केजरीवाल वो शख्स है जो आपके सपनों  को हक़ीक़त में अंजाम देने की कोशिश कऱ रहा है . अकेले सपनों से दुनिया नहीं बदलती . केजरीवाल जी असल में करमयोगी हैं। उन्होंने इस भौतिकवादी संसार में भौतिकवाद का ही सहारा लिया और कुछ अच्छे करम करने कि कोशिश   कर रहे हैं . क्या यह सच नहीं के हम अपनी ज़िन्दगी में अनेकों सपने देखते हैं किन्तु उनको हक़ीक़ी रूप नहीं दे सकते। कम से कम इस बिना पर आप केजरीवाल को एक मुस्कान भेंट कर सकते हैं। 

जब भी केजरीवाल की बात आती है तो अन्ना के साथ धोखे की बात शुरू हो जाती है। अत्यंत खेद की बात है के जो लोग लोकपाल के लिए इतनी दूर दूर से देल्ही में इकठे हुए , वो विपक्ष की एक सीधी सी चाल के सामने घुटने टेक जाएँ। 

इस वक़त  अगर में यह कहूँ के जनता जनार्दन है तो यह मैं खुद को झूठ बोल रहा होउंगा लेकिन अगर मैं यह कहूँ के जनता महा मूर्ख है तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। 

आपको दुःख लगेगा किन्तु जो लोग यह सोच रहे हैं कि लोकपाल या राईट टू रिकॉल मीठे बेरों की भांति बाज़ार में मिल जायेगा, मौजूदा वाक्यात और हालात उनकी राजनैतिक अपरिपक्वता को ही दर्शाते है। अन्ना को कानूनी दांव पेंच की समझ देने वाले भी तो किरण जी और केजरीवाल जी ही थे। ऐसा भी तो हो सकता है के अन्ना ने केजरीवाल को और किरण जी को इस्तेमाल किया हो ? अगर इस आधार पर भी मैं अन्ना के ऊपर धोखा देने का इलज़ाम लगाऊं तो फिर तो मानोगे के केजरीवाल गोबर नहीं, अन्ना ही गोबर है। 

जो डट कर हरेक हालात का सामना करने में दक्ष हैं वो ही करमयोगी हैं। दुसरे सभी थाली के लोटे हैं , जिस तरफ थाली झुकी, उसी तरफ लोट लिए। 

अगर आप वाक्य ही लोकपाल के लिए जंतर मंतर तक पहुंचे थे, तो अब पीछे मत हटें। 

यह स्पष्ट हो चूका है के कानून सिर्फ़ संसद में बनेंगे, गलिओं और चौराहों में या जंतर मंतर पर नहीं और कानून बनाने के लिए एक संवेधानिक रास्ता दर्शाया गया है। 
यह तो पहला चरण है, अभी चुनाव होने हैं , बाद में सरकार बननी है, विधेयक पेश किये जाने हैं , उनको पास करवाना है और फिर कानून बनना है. 

संविधान के अनुसार यही एक रास्ता है वो हासिल करने के लिए जो आप चाहते थे लेकिन आप तो अभी से लोटने लगे, आपमें से कई तो ढेर भी हो चुके। 
अब अगर अन्ना जी मुर्गी खाना चाहते हैं लेकिन मुर्गी को मारना नहीं चाहते या अंडा खाना चाहते हैं लेकिन अंडे को तोडना नहीं चाहते, तो यह सम्भव नहीं है। इसमें कोई तर्क नहीं है। 

एक अमूर्त और एब्स्ट्रैक्ट विचार को धरा पर लाने के लिए एक ही रास्ता बचा है के केजरीवाल की पार्टी के सदस्य चुनाव में खड़े हों, जीतें, संसद में प्रवेश करें और अपनी आवाज़ उठायें। केजरीवाल तो यही कर रहा है न. तो केजरीवाल गलत कैसे हुआ? 

मैं , सव्यं किसी की भी ईमानदारी से प्रभावित नहीं हूँ और न ही किसी चमत्कार की आशा करता हूँ लेकिन जर्मनी में कहते हैं "विश्वास करना अच्छी बात है किन्तु उसको नियंत्रण करना उससे बेहतर होता है". 

मेरी इच्छा तो सिर्फ़ इतनी है के किसी तरह उन कारगर नियंत्रण के उपकरणों को लागू कर दिया जाये जिससे भ्रष्टाचार के ऊपर लगाम लग जाये। उसके बाद जो मर्ज़ी आये, जो मर्ज़ी सरकार बनाये चाहे कोंग्रेस, बी जे पी या मायावती ।

और चूंकि मौजूदा सरकार उस नियंत्रण अवस्था के खिलाफ है, मेरे पास अपनी बात मनवाने का सिर्फ़ एक ही हथियार है जिसका नाम है केजरीवाल। 

मैं खुदगर्ज़ हूँ मैं मानता हूँ लेकिन मेरे पास दूसरा विकल्प ही नहीं है और क्योंके मेरे पास एक ही हथियार है जिसे पांच साल में सिर्फ एक बार ही चला सकता हूँ तो इस बार अपनी ज़िन्दगी का जुआ मैं उसी के नाम का खेलूंगा ताकि मरते वक़त मेरे मन में यह शंका न रह जाये के अगर केजरीवाल जीतता तो शायद 2014 से हम एक लम्बे सफ़र कि शुरुआत कर चुके होते। लेकिन तब  तक मेरे  मन का एक भय और एक शंका कायम रहेगी के वोटें होने से पहले तक अन्ना जी गोबर ही बने रहेंगे या खुल कर सामने आयेंगे और केजरीवाल जी का साथ देंगे। 

मैं पहले भी कह चूका हूँ के केजरीवाल जी एक करमयोगी हैं और उनको उनकी बनती इज़ज़त मिलनी चाहिए। 

अब अगर अन्ना जी ख्वाबों के आधार पर सत्यता से मुंह फेर कर खड़े हैं तो इसमें उनका खुद का दोष है। 

मुझे तरस आता है केजरीवाल के दुश्मनों के ऊपेर. 

अगर केजरीवाल ने शुरुआत के वक़त अन्ना का साथ दिया था तो क्या उनका अपनी खुद की पार्टी बनाने का अधिकार खत्म हो गया? अब अन्ना की पार्टी के सदस्य नया दल नहीं बना सकते क्या ? 

क्या अन्ना जी यह समझ रहे हैं के हिंदुस्तान उनके अधीन हो गया ? 
दिमाग सटक जाता है लोगों का ज़ल्द ही भारत में, बस एक बार दो चार सौ लोग इकठा कर लें ,
इनको लगने लगता है आतमज्ञान और जीव विज्ञानं का सारा भेद इन्होने ही इकठा कर लिया है। 
सीधा बोलूं तो अन्ना एक मूर्ख इंसान है जो लोगों के झूठे सपनों को झूठ की हवा दिखाता है, अगर उन सपनों को वास्तविक रूप देना है तो सिर्फ एक ही रास्ता है और वो है जो केजरीवाल ने चुना। 

ऐसा सत्य किसी काम का नहीं होता जो सिर्फ किताबों कि कहानीओं तक सीमित रह जाये। 

अन्ना जो सोचता है वो सिर्फ किताबों तक है इससे आगे कुछ भी नहीं। केजरीवाल जैसे इंसान करमयोगी होते हैं और उनको इसके लिए बनती इज़ज़त देनी चाहिए, ऐसे इंसान दुनिया में बहुत कम होते हैं जिनको भ्रम से हटकर वास्तविकता का ज्ञान हो । वो वास्तविकता जो बताती है के दुनिया का असल रूप क्या है।   
महात्मा गांधी - अछा सुना हुआ नाम। 
आप क्यों उसकी इज़ज़त करते हैं - वो भी तो हमारे जैसे ही हाड मांस का ही बना हुआ था। 
इसलिए क्योंके खोखली बातों के आलावा उसने आज़ादी भी दिलवाई। 

बिल गेट्स ने विंडोज के सिर्फ़ सुपने नहीं दिखाए , उसे कर के दिखाया। 
किन्तु अन्ना सिर्फ़ सपनों कि बातें कर रहे थे, अब केजरीवाल उसी एब्स्ट्रेक्ट और अमूर्त फलसफा को ज़मीनी स्तर पैर लाने के लिए कोशिश कर रहे हैं तो अन्ना को दुःख क्यों? 

उन्हें यह क्यों लगने लगा के उनको धोखा दिया गया है? 

अगर सीधा कहूँ तो अन्ना जी अपनी हरक़तों कि वजह से पीछे हैं। 

जब तक उन्होंने काम किया, हमने तारीफ़ की लेकिन अब वो बहुत बड़ी जीरो बन गए हैं। 
बदलाव तो आरम्भ हुआ है, इसमें तो कई केजरीवाल  और कई आप शामिल होंगे , 

अगर अन्ना जी यह समझना शुरू कर दे के वो न होते तो तबदीली न होती तो भी वो अहंकार के अँधेरे में डूब चुके भटके हुए इंसान हैं । शायद इंसान की जगह कोई और शबद प्रयुक्त होगा  . 

किसी भी पौदे या विचार को प्रफुल्लित होने के लिए ज़मीन तैयार होनी चाहिए और वो हो चुकी है। अब हर घर आन्गन में लहर चल रही है बदलाव की । 

कोई इसे अपना पेटेंट बनाने कि कोशिश न करे लेकिन अगर यह तबदीली सकारात्मक है तो उसका साथ अवश्य दे। 

हम सब साथ साथ हैं तो अपने जीते जी हम एक नए भारत के सपने को वास्तविक और मूरत रूप दे सकते हैं फिर चाहे एक नहीं दुनिया भर के अखौती  अन्ना   यह कहते रहें के ईमानदारी की वजह से उन्होंने राजनीतिज्ञ बन कर चुनाव में हिस्सा नहीं लिया।

 चलो, अन्ना  जी को एक मौका और देते हैं .
कर्म कर फल की  चिंता मत कर।  अन्ना ,चल उठा धनुष  । सही समय  है, क्या गीता  का सार फिर से दोहराना पड़ेगा? खींच कमान अब , छोड़ पूरे ज़ोर के साथ ऐसे के सभी कहने लगें: बूढ़ा किंगमेकर बन गया .